Monday, July 19, 2010

नमाज़ दिन का सुतून है हदीसशरीफ .

4.3.10विभिन्‍न प्रकार की नमाज और उन्हें पढने का तरीका namaz [ namaj ] ka tariqa
लाखों हिन्‍दी जानने वाले हमारे भाईयों-बहनों को अरबी न समझने के कारण नमाज़ पढने में दिक्‍कत होती है, उनकी परेशानी को देखते हुये, पेश है ऐसी किताब जो नमाज विषय पर हिन्‍दी में सभी जानकारी देती है,
पाँचों नमाजों सहित ईद, जनाजे और जुमे जैसी सब नमाजें सीखने के लिए, और सभी के जानने के लिए कि इनमें क्‍या पढा जाता है, अरबी आयतों को हिन्‍दी में पढकर सीखा भी जा सकता है, namaz ke tarika सीखाने वाली लाजवाब किताब, namaj ka tareeka
http://www.scribd.com/doc/23821733/namaz-ka-tariqa-tarika-namaj-hindi
नमाज़ डाक्‍टर असलम कासमी साहब के शब्‍दों में
namaz हर मनुष्य चाहे वह कहीं भी और किसी भी स्थिति मे हो रात और दिन में पाँच बार ईश्वर के सामने एक विशेष क्रिया कलाप है जिसमें केवल चन्द मिनट लगते हैं, यह जान और समझ कर करना है कि ईश्वर उसे देख रहा है और वह ईश्वर को। जब कोई मनुष्य रात दिन में पाँच बार ईश्वर के सामने इस यक़ीन के साथ खड़ा होता है कि मरने के बाद एक दिन उसे ईश्वर की अदालत में अपने हर अच्छे बुरे कार्य का हिसाब देना है जिसके बदले उसे या तो अनन्त तक के लिए स्वर्ग का आराम मिलेगा या नरक की यातनाएं, तो फिर वह अपने जीवन में अच्छे कार्य करता है और बुरों से बचता है, पाँच समय के अभ्यास से उसके के हृदय में ईश्वरीय सत्ता स्थापित हो जाती है, फिर वह चोरी नही करता, किसी का ना हक़ खून नही बहाता, किसी का हक़ नही मारता, किसी को बुरी नज़र से नही देखता, केवल इसलिए ही नही कि यह कार्य करने से उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है बल्कि इसलिए भी कि वह दुनियावी अदालत की नज़र से तो बच सकता है परन्तु उस ईश्वर की नज़र से नही बच सकता जो हर समय और हर जगह है। अब अगर वह एक अधिकारी है तो रिश्वत नही लेगा केवल इसलिए नही कि उसे अपने से ऊपर के आफिसर का भय है जिसकी वह पकड़ में भी आ सकता है और बच भी सकता है, बल्कि इसलिए कि उसे ईश्वर की पकड़ का यक़ीन है। अब अगर वह एक कर्मचारी है तो उपने कर्तव्य और समय का पालन अधिकारी के डर से नही बल्कि ईश्वरीय डर से करता है, अर्थात् कोई उसे देख रहा हो या न देख रहा है, वह बुराई से बचता है और अच्छे कार्य करता है क्योंकि वह जहाँ भी है ईश्वर उसे देख रहा है जो उसके द्वारा किए कार्यो का हिसाब लेगा।
और अगर कोई नमाज़ पढ़ने के बावजूद भी बुराइयों से नही रूकता तो समझिए कि वह नमाज़ नही पढ़ रहा है केवल औपचारिकता निभा रहा है। क़ुरआन में हैः
नमाज बुराइयों और बे हयाई की बातों से रोकती है। सूरह अनकबूत आयत 45
http://hi.wikipedia.org/wiki/नमाज
नमाज फारसी शब्द है, जो उर्दू में अरबी शब्द सलात का पर्याय है। कुरान शरीफ में सलात शब्द बार-बार आया है और प्रत्येक मुसलमान स्त्री और पुरुष को नमाज पढ़ने का आदेश ताकीद के साथ दिया गया है। इस्लाम के आरंभकाल से ही नमाज की प्रथा और उसे पढ़ने का आदेश है। यह मुसलमानों का बहुत बड़ा कर्तव्य है और इसे नियमपूर्वक पढ़ना पुण्य तथा त्याग देना पाप है। more

नमाज - विकिपीडिया
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Sunday, July 18, 2010

अपना दारुल उलूम देवबन्द अपने देश के लिया फख्र

14.9.09दारूल उलूम देवबन्द - महान इस्लामी विश्व विद्यालय-deoband-islamic-university-india
इस्लामी दुनिया में दारूल उलूम देवबन्द का एक विशेष स्थान है जिसने पूरे क्षेत्र को ही नहीं, पूरी दुनिया क मुसलमानों को प्रभावित किया है। दारूल उलूम देवबन्द केवल इस्लामी विश्वविद्यालय ही नहीं एक विचाराधारा है, जो अंधविश्वास, कूरीतियों व आडम्बरों के विरूध इस्लाम को अपने मूल और शुदध रूप में प्रसारित करता है। इसलिए मुसलमानों में इस विखराधारा से प्रभावित मुसलमानों को ‘‘देवबन्दी‘‘ कहा जाता है।
देवबन्द उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण नगरों में गिना जाता है जो आबादी के लिहाज़ से तो एक लाख से कुछ ज्यादा आबादी का एक छोटा सा नगर है। लेकिन दारूल उलूम ने इस नगर को बडे-बडे नगरों से भरी व सम्मानजनक बना दिया है, जो ना केवल अपने गर्भ में एतिहासिक पृष्ठ भूमि रखता है, अपितु आज भी साम्प्रदायिक सौहार्दद धर्मनिरपेक्षता एवं देश प्रेम का एक अजीब नमूना प्रस्तुत करता है। 40 photos deoband madarsa
देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति व इस्लामी शिक्षा एवं संस्कृति में जो समन्वय आज हिन्दुस्तान में देखने को मिलता है उसका सीधा-साधा श्रेय देवबन्द दारूल उलूम को जाता है। यह मदरसा मुख्य रूप से उच्च अरबी व इस्लामी शिक्षा का केंद्र बिन्दु है। दारूल उलूम ने न केवल इस्लामिक शोध व साहित्य के संबंध में विशेष भूमिका निभायी है, बल्कि भारतीय पर्यावरण में इस्लामिक सोच व संस्कृति को नवीन आयाम तथा अनुकूलन दिया है।
दारूल उलूम देवबन्द की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना कासिम नानोतवी द्वारा रखी गयी थी। वह समय भारतक के इतिहास में राजनैतिक उथल-पुथल व तनाव का समय था, उस समय अंग्रेजों के विरूद्ध लडे गये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) की असफलता के बादल छंट भी ना पाये थे और अंग्रजों का भारतीयों के प्रति दमनचक्र तेज कर दिया गया था, चारों ओर हा-हा-कार मची थी। अंग्रजों ने अपने संपूर्ण शक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन (1857) को कुचल कर रख दिया था। अधिकांश आंदोलनकारी शहीद कर दिये गये थे, (देवबन्द जैसी छोटी बस्ती में 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था) और शेष को गिरफ्तार कर लिया गया था, ऐसे सुलगते माहौल में देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानियों पर निराशाओं के पृहार होने लगे थे। चारों ओर खलबली मची हुई थी। एक प्रश्न चिन्ह सामने था कि किस प्रकार भारत के बिखरे हुए समुदायों को एकजुट किया जासे, किस प्रकार भारतीय संस्कृति और शिक्ष जो टूटती और बिखरती जा रही थी, की सुरक्ष की जाये। उस समय के नेतृत्व में यह अहसास जागा कि भारतीय जीर्ण व खंडित समाज एस समय तक विशाल एवं जालिम ब्रिटिश साम्राज्य के मुकाबले नहीं टिक सकता, जब तक सभी वर्गों, धर्मों व समुदायों के लोगों को देश प्रेम और देश भक्त के जल में स्नान कराकर एक सूत्र में न पिरो दिया जाये। इस कार्य के लिए न केवल कुशल व देशभक्त नेतृत्व की आवशयकता थी, बल्कि उन लोगों व संस्थाओं की आवशयकता थी जो धर्म व जाति से उपर उठकर देश के लिए बलिदान कर सकें।
इन्हीं उददेश्यों की पूर्ति के लिए जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों व संस्थानों ने धर्मनिरपेक्षता व देशभक्ति का पाठ पढाया उनमें दारूल उलूम देवब्नद के कार्यों व सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। स्वर्गीय मौलाना महमूद हसन (विख्यात अध्यापक व संरक्षक दारूल उलूम देवबन्द) उन सैनानियों में से एक थे जिनके कलम, ज्ञान, आचार व व्यवहार से एक बडा समुदाय प्रभावित था, इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शेखुल हिन्द (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभेषित किया गया था, उन्हों ने न केवल भारत में वरन विदेशों (अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, सउदी अरब व मिश्र) में जाकर भारत व ब्रिटिश साम्राज्य की भ्रत्‍सना की और भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध जी खोलकर अंग्रेजी शासक वर्ग की मुखालफत की। बल्कि शेखुल हिन्द ने अफगानिस्तान व ईरान की हकूमतों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उदाहरणतयः यह कि उन्होंने अफगानिस्तान व ईरान को इस बात पर राजी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राजय के विरूद्ध लडने पर तैयार हो तो जमीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे।
शेखुल हिन्द ने अपने सुप्रिम शिष्यों व प्रभावित व्यक्तियों के माध्यम से अंग्रेज के विरूद्ध प्रचार आरंभ किया और हजारों मुस्लिम आंदोलनकारियों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध चल रहे राष्टीय आंदोलन में शामिल कर दिया। इनके प्रमुख शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उबैदुल्ला सिंधी थे जो जीवन पर्यन्त अपने गुरू की शिक्षाओं पर चलते रहे, और अपने देशप्रमी भावनाओं व नीतियों के कारण ही भारत के मुसलमान स्वतंत्रता सेनानियों व आंदोलनकारियों में एक भारी स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं।
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सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफगानिस्तात जाकर अंग्रजों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की सर्वप्रथम स्वतंत्रत सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना दिया। यहीं पर रहकर उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की एक शाखा कायम की जो बाद में (1922 ई.) में मूल कांग्रेस संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस में विलय कर दी गयी। शेखुल हिन्द 1915 ई. में हिजाज (सउदी अरब का पहला नाम था) चले गये, उन्होंने वहां रहते हुए अपने साथियों द्वारा तुर्की से संपर्क बना कर सैनिक सहायता की मांग की।
सन 1916 ई. में इसी संबंध में शेखुल हिन्द इस्तम्बूल जाना चाहते थे। मदीने में उस समय तुर्की का गवर्नर ग़ालिब तैनात था शेखुल हिन्द को इस्तम्बूल के बजाये तुर्की जाने के लिए कहा परन्तु उसी समय तुर्की के युद्ध मंत्री अनवर पाशा हिजाज पहुंच गये। शेखुल हिन्द ने उनसे मुलाकात की और अपने आंदोलन के बारे में बताया। अनवर पाशा ने भारतीयों के प्रति सहानुभूति प्रकट की और अंग्रेज साम्राज्य के विरूद्ध युद्ध करने की एक गुप्त योजना तैयार की। हिजाज से यह गुप्त योजना, गुप्त रूप से शेखुल हिन्द ने अपने शिष्य मौलाना उबैदुल्ला सिंधी को अफगानिसतान भेजा, मौलाना सिंधी ने इसका उत्तर एक रेशमी रूमाल पर लिखकर भेजा, इसी प्रकार रूमालों पर पत्र व्यवहार रहा। यह गुप्त सिलसिला ‘‘तहरीक ए रेशमी रूमाल‘‘ के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। इसके सम्बंध में सर रोलेट ने लिखा है कि ‘‘ब्रिटिश सरकार इन गतिविधियों पर हक्का बक्‍का थी‘‘।
Deoband Nazam urdu/hindi youtube
wikipedia article
सन 1916 ई. में अंगेजों ने किसी प्रकार शेखुल हिन्द को मदीने में गिरफ्तार कर लिया। हिजाज से उन्हें मिश्र लाया गया और फिर रोम सागर के एक टापू मालटा में उनके साथियों मौलान हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उजैर गुल हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद सहित जेल में डाल दिया था। इन सबको चार वर्ष की बामुशक्कत सजा दी गी। सन 1920 में इन महान सैनानियां की रिहाई हुई।
शेखुल हिन्द की अंगेजों के विरूद्ध तहरीके रेशमी रूमाल, मौलाना मदनी की सन 1936 से सन 1945 तक जेल यात्रा, मौलाना उजैरगुल, हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद का मालटा जेल की पीडा झेलना, मौलाना सिंधी की सेवायें इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण हैं कि दारूल उलूम ने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई है। इस संस्था ने ऐसे अनमोल रत्न पैदा किये जिन्होंने अपनी मातृ भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा दिया। ए. डब्लयू मायर सियर पुलिस अधीक्षक (सी. आई. डी. राजनैतिक) पंजाब ने अपनी रिपोर्ट न. 122 में लिखा था जो आज भी इंडियन आफिस लंदन में सुरक्षित है कि ‘‘मौलाना महमूद हसन (शेखुल हिन्द) जिन्हें रेशमी रूमाल पर पत्र लिखे गये, सन 1915 ई. को हिजरत करके हिजाज चले गये थे, रेशमी खतूत की साजिश में जो मोलवी सम्मिलित हैं, यह लगभग सभी देवब्नद स्कूल से संबंधित हैं।‘‘
गुलाम रसूल मेहर ने अपने पुस्तक ‘‘सरगुजस्त ए मुजाहिदीन‘‘ (उर्दू) के पृष्‍ठ न. 552 पर लिखा है कि ‘‘मेरे अध्ययन और विचार का सारांश यह है कि हजरत शेखुल हिन्द अपनी जिन्दगी के प्रारंभ में एक रणनीति का खाका तैयार कर चुके थे और इसे कार्यान्वित करने की कोशिश उन्होंने उस समय आरंभ कर दी थी जब हिन्दुस्तान के अंदर राजनीतिक गतिविधियां केवल नाम मात्र थी‘‘।
उडीसा के गवर्नर श्री बिशम्भर नाथ पाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि दारूल उलूम देवबन्द भारत के स्वतंत्रता संग्राम में केंद्र बिन्दु जैसा ही था, जिसकी शाखायें दिल्ली, दीनापुर, अमरोहा, कारची, खेडा और चकवाल में स्थापित थी। भारत के बाहर उत्तर पश्चिमी सीमा पर छोटी सी सवतंत्र रियासत ‘‘यागिस्तान‘‘ भारत के स्वतंत्रता का केंद्र था, यह आंदोलन केवल मुसलमानों का ना था बल्कि पंजाब के सिक्खों व बंगाल की इंकलाबी पार्टी के सदस्यों को भी इसममें शामिल किया था।
इसी पकार असंख्यक तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि दारूल उलूम देवबन्द स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भी देश प्रेम का पाढ पढता रहा है जैसे सन 1947 ईं. में भारत को आजादी तो मिली, परन्तु साथ साथ नफरतें आबादियों का स्थानंतरण व बंटवारा जैसे कटु अनुभव का समय भी आया, परन्तु दारूल उलूम की विचारधारा टस से मस ना हुई। इसने डट कर सबका विरोध किया और इंडियन नेशनल कांग्रस के संविधन में ही अपना विश्वास व्यक्त कर पाकिस्तान का विरोध किया तथा अपने देशप्रेम व धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण दिया। आज भी दारूल उलूम अपने देशप्रेम की विचार धारा के लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।
दारूल उलूम देवबन्द में पढने वाले विद्यार्थियों को मुफत शिक्षा, भोजन, आवास व पुस्तकों की सुविधा दी जाती है। दारूल उलूम देवब्नद ने अपनी स्थापतना से आज (हिजरी 1283 से 1424) सन 2002 तक लगभग 95 हजार महान विद्वान, लेखक आदि पैदा किये हैं। दारूल उलूम में इस्लामी दर्शन, अरबी, फारसी, उर्दू की शिक्षा के साथ साथ किताबत (हाथ से लिखने का कला), दर्जी का कार्य व किताबों पर जिल्दबन्दी, उर्दू, अरबी, अंगेजी, हिन्दी में कम्पयूटर तथा उर्दू पत्रकारिता का कोर्स भी कराया जाता है। दारूल उलूम में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा व साक्षात्कार से गुजरना पडता है। प्रवेश के बाद शिक्षा मुफत दी जाती है। दारूल उलूम देवबन्द ने अपने दार्शन व विचारधारा से मुसलमानों में एक नई चेतना पैदा की है जिस कारण देवबन्द स्कूल का प्रभाव भारतीय महाद्वीप पर गहरा है।
साभार http://www.darululoom-deoband.com/

Tuesday, July 13, 2010

इस से इस्लाम को समझने की कोशिश करें

इस्लामिक वेबदुनिया
आप मुझे इस्लाम नाम से जान सकते हैं। इस्लाम जिसके मायने शान्ति है। इसके दूसरे मायने अपनी इच्छाओं को सर्वशक्तिमान ईश्वर के हवाले कर देना है। इस जमीन पर मैं पहले पैगम्बर और पहले इन्सान आदम के साथ आया। मेरा आखरी और फाइनल एडीशन मुहम्मद सल्ललाहो अलेहेवसल्लम लेकर आए। दुनिया का कोई हिस्सा और कोई दौर ऐसा नहीं गुजरा जहां मेरी उपस्थिति नहीं रही हो। मैं हर दौर और हर हिस्से में रहा हूं। लगभग एक लाख चौबीस हजार पैगम्बर और ईश्वरीय दूतों के साथ मैं आया। अक्सर लोग यह समझते हैं कि पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलेहेवसल्लम के साथ ही मैं आया। जबकि ऐसा नहीं है। वे तो मेरा फाइनल मैसेज लाने वाले आखरी पैगम्बर हैं। हर दौर और हर काल में मेरी बुनियादी तालीम एक ही रही है- एक ईश्वर की इबादत करो, ईश्वर के भेजे हुए पैगम्बरों पर भरोसा रख उनके मुताबिक जिंदगी गुजारो और याद रखो मरने के बाद सबको सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने हाजिर होना है और अपने हर कर्म का हिसाब देना है। मेरा मकसद तो बस यही है-इंसानियत और इंसाफ को बढ़ावा देना और इंसानों को सुकून और कामयाब जिंदगी मुहैया कराना।

सेठ रामजी लाल गुप्ता अब "सेठ मुहम्मद उमर"

बाबरी मस्जिद शहीद करने के लिए अपने लाखों रुपये खर्च करने वाला सेठ आख़िर खुद मुसलमान क्यो हो गया?
जाहिर है आप यह बात ज़रूर जानना चाहेंगें .तो फिर पढ़िए यह इंटरव्यू.....
अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि व बरकातुह
सेठ मुहम्मद उमरः मौलवी साहब व अलैकुमुस्सलाम
अहमदः सेठ साहब, दो तीन महीने से अबी(मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) आपका बहुत जिक्र कर रहे हैं, अपनी तकरीरों में आप का जिक्र करते हैं और मुसलमानों को डराते हैं कि अल्लाह तआला अपने बन्दों की हिदायत के लिये हर चीज से काम लेने पर कादिर हैं।
सेठ उमरः मौलवी साहब, हजरत साहब बिल्कुल सच कहते हैं, मेरी जिन्दगी खुद अल्लाह की दया व करम की खुली निशानी है, कहाँ मुझ जैसा, खुदा और खुदा के घर का दुश्मन और कहाँ मेरे मालिक का मुझ पर करम। काश! कुछ पहले मेरी हजरत साहब या हजरत के किसी आदमी से मुलाकात हो जाती तो मेरा लाडला बेटा ईमान के बगैर न मरता, (रोने लगते हैं और बहुत देर तक रोते रहते हैं, रोते हुये) मुझे कितना समझाता था और मुसलमानों से कैसा ताल्लुक रखता था वह और ईमान के बगैर मुझे बुढापे में अपनी मौत का गम दे कर चला गया।
अहमदः सेठ साहब, पहले आप अपना खानदानी परिचय(तआरूफ) कराईये।
सेठ उमरः मैं लखनऊ के करीब एक कस्बे के ताजिर खानदान में पहली बार अब से 69 साल पहले 6 दिसम्बर 1939 में पैदा हुआ, गुप्ता हमारी गौत है, मेरे पिताजी किराना की थोक की दुकान करते थे, हमारी छटी पीढी से हर एक के यहाँ एक ही औलाद होती आयी है, मैं अपने पिताजी का अकेला बेटा था, नवीं क्लास तक पढ़ कर दुकान पर लग गया, मेरा नाम रामजी लाल गुप्ता मेरे पिताजी ने रखा।
अहमदः पहली मर्तबा 6 दिसंबर को पैदा हुये तो क्या मतलब है?
सेठ उमरः अब दोबारा असल में इसी साल 22 जनवरी को चन्द महीने पहले मैं ने दोबारा जन्म लिया और सच्ची बात यह है कि पैदा तो में अभी हुआ, पहले जीवन को अगर गिनें ही नहीं तो अच्छा है, वह तो अन्धेरा ही अन्धेरा है।
अहमदः जी! तो आप खानदानी तआरूफ करा रहे थे?
सेठ उमरः घर का माहौल बहुत धार्मिक (मजहबी) था, हमारे पिताजी जिले के बी. जे. पी. जो पहले जनसंघ थी, के जिम्मेदार थे, उसकी वजह से इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी हमारे घर की पहचान थी और यह मुस्लिम दुश्मनी जैसे घुट्टी में पडी थी। 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने से लेकर बाबरी मस्जिद की शहादत के घिनावने जुर्म तक में इस पूरी तहरीक में आखरी दरजे के जुनून के साथ शरीक रहा, मेरी शादी एक बहुत भले और सेक्यूलर खानदान में हुई, मेरी बीवी का मिजाज़ भी इसी तरह का था और मुसलमानों से उनके घरवालों के बिल्कुल घरेलू ताल्लुकात थे। मेरी बारात गयी, तो सारे खाने और शादी का इन्तजशम हमारे ससुर के एक दोस्त खाँ साहब ने किया था और दसयों दाढ़ियों वाले वहाँ इन्तज़ाम में थे जो हम लोगों को बहुत बुरा लगा था और मैं ने एक बार तो खाना खाने से इन्कार कर दिया था कि खाने में इन मुसलमानों का हाथ लगा है, हम नहीं खायेंगे मगर बाद में मेरे पिताजी के एक दोस्त पण्डित जी उन्होंने समझाया कि हिन्दू धर्म में कहाँ आया है कि मुसलमानों के हाथ लगा खाना नहीं खाना चाहिये। बडी कराहियत के साथ बात न बढाने के लिये मैं ने खाना खा लिया। 1952 में मेरी शादी हुयी थी, नौ साल तक हमारे कोई औलाद नहीं हुई, नो साल के बाद मालिक ने 1961 में एक बेटा दिया, उसका नाम मैं ने योगेश रखा, उसको मैं ने पढाया और अच्छे से स्कूल में दाखिल कराया और इस ख्याल से कि पार्टी और कोम के नाम इसको अर्पित (वक्फ) करूँगा, उसको समाज शास्त्र में पी. एच. डी कराया। शुरू से आखिर तक वह टापर रहा मगर उसका मिजाज़ अपनी माँ के असर में रहा और हमेशा हिन्दूओं के मुकाबले मुसलमानों की तरफ माइल रहता। फिर्केवाराना मिजाज़ से उसको अलर्जी थी, मुझ से बहुत अदब करने के बावजूद इस सिलसिले में बहस कर लेता था। दो बार वह एक-एक हफ्ते के लिये मेरे राम मन्दिर तहरीक में जुडने और उस पर खर्च करने से नाराज़ हो कर घर छोड कर चला गया, उसकी माँ ने फोन पर रो-रो कर उसको बुलाया।
अहमदः अपने कबुले इस्लाम के बारे में जरा तफसील से बताईये?
सेठ उमरः मुसलमानों को मैं इस मुल्क पर आक्रमण (हमला) करने वाला मानता था। या फिर मुझे राम-जन्म भूमि मन्दिर को गिरा कर मस्जिद बनाने की वजह से बहुत चिढ़ थी और मैं हर कीमत पर यहाँ राम मन्दिर बनाना चाहता था, इसके लिये मैं ने तन, मन, धन सब कुछ लगाया। 1987 से लेकर 2005 तक राम मन्दिर आन्दोलन और बाबरी मस्जिद गिराने वाले कारसेवकों पर विश्व हिन्दू परिषद को चन्दे में कुल मिला कर 25 लाख रूपये अपनी ज़ाती कमायी से खर्च किये। मेरी बीवी और योगेश इस पर नाराज़ भी हुये। योगेश कहता था इस देश पर तीन तरह के लोग आकर बाहर से राज करते आये, एक तो आर्यन आये उन्होंने इस देश में आकर जुल्म किया, यहाँ के शुद्रों को दास बनाया और अपनी साख बनायी, देश के लिये कोई काम नहीं किया, आखरी दरजे में अत्याचार (जुल्म) किये, कितने लोगों को मौत के घाट उतारा, तीसरे अंग्रेज आये उन्होंने भी यहाँ के लोगों को गुलाम बनाया, यहाँ का सोना, चाँदी, हीरे इंगलैण्ड ले गये, हद दरजे अत्याचार किये, कितने लोगों को मारा कत्ल किया, कितने लागों का फाँसी लगायी।
दूसरे नम्बर पर मुसलमान आये, उन्होंने इस देश को अपना देश समझ कर यहाँ लाल किले बनाये, ताज महल जैसा देश के गौरव का पात्र (काबिले फखर इमारत) बनायी, यहाँ के लोगों को कपडा पहनना सिखाया, बोलना सिखाया, यहाँ पर सडकें बनवायीं, सराएँ बनवायीं, खसरा खतोनी डाक का निजाम और आब-पाशी का निजाम बनाया, नहरे निकालीं और देश में छोटी-छोटी रियास्तों को एक करके एक बडा भारत बनाया। एक हजार साल अल्प-संख्या (अकल्लियत) में रह कर अक्सरियत पर हुकूमत की और उनको मजहब की आज़ादी दी, वह मुझे तारीख के हवालों से मुसलमान बादशाहों के इन्साफ के किस्से दिखाता, मगर मेरी घूट्टी में इस्लाम दुश्मनी थी वह न बदली।
30 दिसम्बर 1990 में भी मैं ने बढ-चढ कर हिस्सा लिया और 6 दिसम्बर 1992 में तो मैं खुद अयोध्या गया, मेरे जिम्मे एक पूरी टीम की कमान थी, बाबरी मस्जिद शहीद हुयी तो मैं ने घर आकर एक बडी दावत की, मेरा बेटा योगेश घर से नाराज़ होकर चला गया, मैं ने खूब धूम-धाम से जीत की तकरीब मनायी। राम मन्दिर के बनाने के लिये दिल खोल कर खर्च किया, मगर अन्दर से एक अजीब सा डर मेरे दिल में बैठ गया और बार-बार ऐसा ख्याल होता था कोई आसमानी आफत मुझ पर आने वाली है। 6 दिसम्बर 1993 आया तो सुबह मेरी दुकान और गोदाम मैं जो फासले पर थे बिलजी का तार शार्ट होने से दोनों में आग लग गयी और तकरीबन दस लाख रूपये से ज्यादा का माल जल गया। उसके बाद से तो और भी ज्यादा दिल सहम गया। हर 6 दिसम्बर को हमारा पूरा परिवार सहमा सा रहता था और कुछ न कुछ हो भी जाता था। 6 दिसम्बर 2005 को योगेश एक काम के लिये लखनऊ जा रहा था उसकी गाडी एक ट्रक से टकरायी और मेरा बेटा और ड्राईवर मौके पर इन्तकाल कर गये। उस का 9 साल का नन्हा सा बच्चा और 6 साल की एक बेटी है। यह हादसा मेरे लिये नाकाबिले बरदाश्त था और मेरा दिमागी तवाजुन खराब हो गया। कारोबार छोड कर दर-बदर मारा-मारा फिरा। बीवी मुझे बहुत से मौलाना लोगों को दिखाने ले गयी, हरदोई में बडे हजरत साहब के मदरसे में ले गयी, वहाँ पर बिहार के एक कारी साहब हैं, तो कुछ होश तो ठीक हुये, मगर मेरे दिल में यह बात बैठ गयी कि मैं गलत रास्ते पर हूँ, मुझे इस्लाम को पढना चाहिये इस्लाम पढना शुरू किया।
अहमदः इस्लाम के लिये आपने क्या पढा?
सेठ उमरः मैं ने सब से पहले हजरत मुहम्मद सल्ल. की एक छोटी सीरत पढ़ी, उसके बाद ‘इस्लाम क्या है?’ पढी। ‘इस्लाम एक परिचय’ मौलाना अली मियाँ की पढी। 5 दिसम्बर 2006 को मुझे हजरत साहब की छोटी सी किताब ‘आप की अमानत -आपकी सेवा में’ एक लडके ने लाकर दी। 6 दिसंबर अगले रोज थी, मैं डर रहा था कि अब कल को किया हादसा होगा, उस किताब ने मेरे दिल में यह बात डाली कि मुसलमान होकर इस खतरे से जान बच सकती है और में 5 दिसंबर की शाम को पाँच छ लोगों के पास गया मुझे मुसलमान कर लो, मगर लोग डरते रहे, कोई आदमी मुझे मुसलमान करने का तैयार न हुआ।
अहमदः आप 6 दिसम्बर 2006 को मुसलमान हो गये थे, आप तो अभी फरमा रहे थे कि चन्द महीने पहले 22 जनवरी 2009 को आप मुसलमान हुये।
मुहम्मद उमरः मैं ने 5 दिसम्बर 2006 को मुसलमान होने का पक्का इरादा कर लिया था, मगर 22 जनवरी को इस साल तक मुझे कोई मुसलमान करने को तैयार नहीं था, हजरत साहब को एक लडके ने जो हमारे यहाँ से जाकर फुलत मुसलमान हुआ था बताया कि एक लाला जी जो बाबरी मस्जिद की शहादत में बहुत खर्च करते थे मुसलमान होना चाहते हैं, तो हजरत ने एक मास्टर साहब को (जो खुद बाबरी मस्जिद की शहादत में सब से पहले कुदाल चलाने वाले थे) भेजा, वह पता ठीक न मालूम होने की वजह से तीन दिन तक धक्के खाते रहे, तीन दिन के बाद 22 जनवरी को वह मुझे मिले और उन्होंने मुझे कलमा पढवाया और हजरत साहब का सलाम भी पहुँचाया, सुबह से शाम तक वह हजरत साहब से फोन पर बात कराने की कोशिश करते रहे मगर हजरत महाराष्ट्र के सफर पर थे, शाम को किसी साथी के फोन पर बडी मुश्किल से बात हुयी। मास्टर साहब ने बताया कि सेठ जी से मुलाकात हो गयी है और अल्हम्दु लिल्लाह उन्होंने कलमा पढ लिया है, आप से बात करना चाहते हैं और आप इन्हें दोबारा कल्मा पढवा दें, हजरत साहब ने मुझे दोबारा कल्मा पढवा दिया और हिन्दी में भी अहद(वचन, वादा) करवाया।
मैं ने जब हजरत साहब से अर्ज किया कि हजरत साहब! मुझ जालिम ने अपने प्यारे मालिक के घर को ढाने और उसकी जगह शिर्क(अनेकश्वरवाद) का घर बनाने में अपनी कमायी से 25 लाख रूपये खर्च किये हैं, अब मैं ने इस गुनाह की माफी के लिये इरादा किया है कि 25 लाख रूपये से एक मस्जिद और मदरसा बनवाऊँगा आप अल्लाह से दुआ किजिये कि जब उस करीम मालिक ने अपने घर को गिराने और शहीद करने को मेरे लिये हिदायत का जरिया बना दिया है तो मालिक मेरा नाम भी अपना घर ढाने वालों की फहरिस्त से निकाल कर अपना घर बनाने वालों में लिख लें और मेरा कोई इस्लामी नाम भी आप रख दिजिये, हजरत साहब ने फोन पर बहुत मुबारक बाद दी और दुआ भी की और मेरा नाम मुहम्मद उमर रखा, मेरे मालिक का मुझ पर कैसा अहसान हुआ, मौलवी साहब अगर मेरा रवाँ-रवाँ, मेरी जान, मेरा माल सब कुछ मालिक के नाम पर कुरबान हो जाये तो भी इस मालिक का शुक्र कैसे अदा हो सकता है कि मेरे मालिक ने मेरे इतने बडे जुल्म और पाप को हिदायत का जरिया बना दिया।
अहमदः आगे इस्लाम को पढने वगैरा के लिये आपने क्या किया?
सेठ उमरः मैंने अल्हम्दु लिल्लाह घर पर टयूशन लगाया है, एक बडे नेक मौलाना साहब मुझे मिल गये हैं वह मुझे कुरआन भी पढा रहे हैं समझा भी रहे हैं।
अहमदः आप की बीवी और पोते-पोती का कया हुआ?
सेठ उमरः मेरे मालिक का करम है कि मेरी बीवी, योगेश की बीवी और दोनों बच्चे मुसलमान हो गये हैं और हम सभी साथ में पढते हैं।
अहमदः आप यहाँ दिल्ली किसी काम से आये थे?
सेठ उमरः नहीं सिर्फ मौलाना ने बुलाया था, एक साहब मुझे लेने के लिये गये थे, हजरत साहब से मिलने का बहुत शौक था, बारहा(अकसर) फोन करता था मगर मालूम होता था कि सफर पर हैं, अल्लाह ने मुलाकात करा दी, बहुत ही तसल्ली हुयी।
अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) से और क्या बातें हुयीं?
सेठ उमरः हजरत साहब ने मुझे तवज्जेह दिलायी कि आपकी तरह कितने हमारे खूनी रिश्ते के भाई बाबरी मस्जिद की शहादत में गलतफहमी में शरीक रहे, आपको चाहिये कि उन पर काम करें। उन तक सच्चाई को पहुँचाने का इरादा तो करें, मैं ने अपने ज हन से एक फहरिस्त बनायी है, अब मेरी सहत इस लायक नहीं कि मैं कोई भाग दौड करूँ मगर जितना दम है वह तो अल्लाह का और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कलमा उसके बन्दों तक पहुँचाने में लगना चाहिये।
अहमदः मुसलमानों के लिये कोई पैगाम आप देगें?
सेठ मुहम्मद उमरः मेरे योगेश का ग़म मुझे हर लम्हे सताता है, मरना तो हर एक को है, मौलवी साहब! मौत तो वक्त पर आती है और बहाना भी पहले से तै है मगर ईमान के बगैर मेरा ऐसा प्यारा बच्चा जो मुझ जैसे जालिम और इस्लाम दुश्मन बल्कि खुदा दुश्मन के घर पैदा होकर सिर्फ मुसलमानों का दम भरता हो वह इस्लाम के बगैर मर गया, इसमें मुसलमानों के हक अदा न करने का अहसास मेरे दिल का ऐसा ज़ख्‍म है जो मुझे खाये जा जा रहा है, ऐसे न जाने कितने जवान, बूढे, मौत की तरफ जा रहे हैं उनकी खबर लें।
अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया सेठ उमर साहब! अल्लाह तआला आपको बहुत-बहुत मुबारक फरमाये, योगेश के सिलसिले में तो अबी ऐसे लोगों के बारे में कहते हैं कि फितरते इस्लामी पर रहने वाले लोगों को मरते वक्त फरिश्ते कलमा पढ़वा देते हैं, ऐसे वाकिआत ज़ाहिर भी हुये हैं, आप अल्लाह की रहमत से यही उम्मीद रखें, योगेश मुसलमान होकर ही मरे हैं।
मुहम्मद उमरः अल्लाह तआला आपकी जबान मुबारक करे, मौलवी अहमद साहब! अल्लाह करे ऐसा ही हो, मेरा फूल सा बच्चा मुझे जन्नत में मिल जाये।
अहमदः आमीन, सुम्मा आमीन, इन्शा अल्लाह जरूर मिलेगा, अस्सलामु अलैकुम
सेठ मुहम्मद उमरः व अलैकुमुस्सलाम
(साभारः मासिक ‘अरमुगान’ फुलत, जून 2009)

Saturday, July 3, 2010

इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके muslim होने की उम्मीद नहीं।-पूर्व बजरंग दल कार्यकर



मुहम्मद इसहाक (पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार) से एक दिलचस्प मुलाकात
...हम तीनों ने बजरंग दल में अपना नाम लिखवाया। आडवाणी जी की रथयात्रा में हम लोग ग्वालियर जाकर शामिल हुए और चार रोज साथ चले। हमारे घरवाले सभी इस फैसले से खुश हुए। एक रोज योगेश के पिताजी ने जो स्कूल में टीचर भी थे। हम तीनों को अपने घर बुलाया, मेरे और योगेन्द्र के पिताजी को भी बुलाया और बोले ‘‘हम तुम तीनों भाईयों को राम नाम पर छोडते हैं। अगर राम मन्दिर के नाम पर तुम्हारी बली भी चढ जाए तो पीछे न हटना, दुनिया में तुम अमर हो जाओगे। उन्होंने हमारे तीनों के सरों पर अंगोछा बाँधा। हम लोगों का बडा हौसला बढा और भी जोश पैदा हुआ। 30 अक्तूबर को हम लोग कारसेवा में पहुँचे मगर.... - मुहम्मद इसहाक (अशोक कुमार)

अहमदः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
इसहाक(अशोक): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
अहमदः इस्हाक भाई। आप से तो 7 दिसम्बर की रात के बाद मुलाकात ही न हो पायी, कल अबी (मौलाना कलीम सिददीकी साहब) ने बताया कि आपका फोन आया था, आप दिल्ली आ रहे हैं तो खुशी हुई रात ही अबी ने फरमा दिया था कि आईन्दा माह के लिए आपसे इन्टरव्यू लूं।
इसहाकः हाँ अहमद भाई मौलाना साहब ने मुझ से भी आज सुबह ही बताया कि अरमुगान में इस महीने तुम्हारा इन्टरव्यू छपना है। मैं ने कहा मुझे शर्म आती है मगर उन्होंने हुक्म दिया कि तुम्हारा हाल सुनकर लोगों में दावत (धर्म निमन्त्राण) का जज़्बा पैदा होगा और दावत का काम करने वालों में खौफ कम होगा। तुम्हें भी सवाब (फल) मिलेगा। मैं ने कहा फिर तो अच्छा है।


अहमदः इसहाक भाई, अपना खानदानी तआरुफ कराएँ।
इसहाकः अहमद भाई। मैं यु. पी. के मशहूर जिला रामपुर में टान्डा बादली कस्बे के करीब एक गाँव के सैनी खानदान में 7 दिसंबर 1968 में पैदा हुआ। घर वालों ने मेरा नाम अशोक कुमार रखा। पिताजी श्री पुरण सिंह जी एक कम पढे लिखे किसान थे। मैं ने आठवी क्लास तक अपने गांव के जूनियर हाई स्कूल में पढा। हाईस्कूल और इन्टर मैं ने रामपुर में किया, बाद में लखनऊ में सिविल इन्जिनियरिंग में डिप्लोमा किया। एक प्राईवेट कन्स्ट्रक्शन कम्पनी में नौकरी लग गयी थी। बचपन में गुस्सा बहुत था। कई बार स्कूल में टीचर से भी लडाई हुई। कम्पनी में रोज-रोज कुछ न कुछ होता रहता था, नौकरी छोड आया। मेरे दो दोस्त पहली क्लास से इन्टर तक साथ पढे थे। एक का नाम योगेश कुमार और दूसरे का योगेन्द्र सिंह था। दोनों हमारी बिरादरी के थे। एक रिश्ते में भाई होते थे। तीनों साथ पढते और वर्जिश भी साथ करते थे। कुछ रोज पहलवानी भी की। राम-जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का झगडा हुआ तो हम तीनों ने बजरंग दल में अपना नाम लिखवाया। आडवाणी जी की रथयात्रा में हम लोग ग्वालियर जाकर शामिल हुए और चार रोज साथ चले। हमारे घरवाले सभी इस फैसले से खुश हुए। एक रोज योगेश के पिताजी ने जो स्कूल में टीचर भी थे। हम तीनों को अपने घर बुलाया, मेरे और योगेन्द्र के पिताजी को भी बुलाया और बोले ‘‘हम तुम तीनों भाईयों को राम नाम पर छोडते हैं। अगर राम मन्दिर के नाम पर तुम्हारी बली भी चढ जाए तो पीछे न हटना, दुनिया में तुम अमर हो जाओगे। उन्होंने हमारे तीनों के सरों पर अंगोछा बाँधा। हम लोगों का बडा हौसला बढा और भी जोश पैदा हुआ। 30 अक्तूबर को हम लोग कारसेवा में पहुँचे मगर हम अभी जगह पर पहुँच नहीं पाये थे कि मुलायम सरकार में गोली चल गयी और हमें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और ट्रेन में सवार करके रामपुर लाके छोडा। हमारे गुस्से की हद न रही। मैं ने रास्ते में कई सिपाहियों की पिटाई भी की मगर उन्होंने हमें यह कहकर ठण्डा किया कि मुलायम सरकार तो गिरेगी, हमारी सरकार आयेगी तो उस वक्त तुम अपने अरमान पूरे कर लेना। नवम्बर 1992 में हम लोग बाबरी मस्जिद शहीद करने के शौक में अयोध्या पहुँच गये। सर्दी के कपडे भी पूरे साथ नहीं थे। अलग-अलग आश्रमों में रहते-रहते हमें वहाँ रहकर बडी हैरत हुई कि अक्सर साधुओं ने हमें बाबरी मस्जिद शहीद करने में शामिल होने से मना किया और उन्होंने हमें इस तरह डराया जैसे हम कोई पाप कर रहे हैं। एक साधू ने तो यह कहा ‘‘मैं सच कहता हूँ अगर रामचन्द्र जी जिवित(जिन्दा) होते, तो भी हरगिज यह पाप यानी बाबरी मस्जिद गिराने का काम न करने देते। हमें उन समझाने वालों पर बहुत गुस्सा आता। 6 दिसम्बर 1992 को भीड मस्जिद के पास जमा हो गयी, हमारे संचालक ने हमें बताया था कि जैसे ही हम इशारा करेंगे, धावा बोल देना। अभी उमा भारती ने नारा लगाया था कि हम पिल पडे। योगेश तो भीड में गिरगया। लोग उस पर चलते रहे किसी ने देखकर उसका हाथ पकडा। वह उठा, महीनों बीमार रहा, उसकी पसलियाँ टूट गयी थीं। खुशी-खुशी हम एक ईंट लेकर घर आये। रास्ते में लोग हमारा स्वागत (इस्तकबाल) करते थे। घरवालों ने हमारे स्वागत में एक प्रोग्राम किया और हम को फूलों से तौला गया, कई साल तक लोग हम को शाबाशी देते रहे।


अहमदः अपने कुबूले इस्लाम के बारे में कुछ बताईये।
इस्हाकः बाबरी मस्जिद को शहीद करके अहमद भैया यूँ तो हमने अपने अरमान पूरे कर लिये, मगर न जाने सिर्फ मुझ अकेले को ही नहीं हम तीनों का हाल यह था कि हम अपने दिल में अन्जाने खतरे से डरे-डरे से रहते थे और हर एक को यह लगता था कि शायद अब कोई खतरा आ जाये, कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि आसमान से कोई आग की चटटान हमें दबाने वाली है। बाबरी मस्जिद की शहादत की हर बर्सी पर यानी 6 दिसम्बर को हमारे लिए दिन रात काटना मुश्किल होता था। ऐसा लगता था कि आज तो जरूर कोई आफत आयेगी। पिछले 6 दिसम्बर को यह खतरा पिछले सालों से ज्यादा ही था। हम लोग डर की वजह से 6 दिसम्बर को कभी घर से नहीं निकलते थे और जब 6 तारीख गुजर जाती तो हम लोग बहुत सुकून महसूस करते। 7 दिसम्बर 2006 की सुबह को हम तीनों घर से निकले, मुझे रामपुर में एक जरूरी काम था मेरे साथी भी साथ हो लिए। रामपुर बस अड्डे पर हमारा एक कॉलिज का साथी रईस अहमद मिला। उस ने हमें देखा तो करीब आया। मजाक के अन्दाज में बोला ‘अशोक अब तुम लोगों की बारी है, तैयार हो जाओ’ मैं ने कहा किस चीज की बारी है?’ उसने कहा ‘पहले पागल होने की और फिर मुसलमान होने की।’ मैंने कहा ‘चोंच बंद कर। उसने कहा ‘अखबार पढा है कि नहीं? मैं ने कहा ‘अखबार में क्या है?’ उस ने अपने बैग से एक उर्दू ‘सहारा’ अखबार निकाला और मुहम्मद आमिर और उमर के इस्लाम कुबूल करने की खबर पूरी सुना दी। हम लोगों को गुस्सा भी आया और डर भी लगा, मैं ने कहा ‘उर्दू अखबार है झूठी खबर होगी। उसने हिन्दी के दो अखबार निकाले और मुझे दिखाए। छोटी-छोटी दोनों में खबरें दिखाईं। मैंने दोबारा उर्दू की खबर जो तफसील से थी, पढने को कहा। मेरे दूसरे साथियों को भी गुस्सा आया और मशवरा किया कि फुलत जाकर मालूम करना चाहिये। बात को साफ करना चाहिये वरना कितने ही लोगों के धर्म भ्रष्ट हो जायेंगे। रामपुर से हम लोग मेरठ की बस में बैठे और फिर खतौली पहुँचे और एक जुगाड में बैठ कर फुलत पहुँचे। मौलाना साहब नमाज के लिये गये थे। नमाज पढकर आये तो एक साहब ने बताया कि यह मौलाना कलीम साहब हैं। हम लोग कुछ तो गुस्से में थे और कुछ ज्यादा सख्त लहजे में मैं ने मौलाना साहब को अखबार दिखाकर कहा ‘यह खबर आपने छपवायी है, यह खबर आपने किस तरह छपवाई है?’ हम तीनों बिल्कुल जट अन्दाज में बडे सख्त लहजे में बात कर रहे थे। मगर मौलाना साहब न जाने किस दुनिया के आदमी थे। बहुत ही प्यार से बोले, मेरे भाई, आप अपने खूनी रिश्ते के भाई के यहाँ आये हैं। आप हमारे हम आपके। यह तड-बड तो शहर के लोगों में होती है। आप कहाँ से तशरीफ लाये हैं, पहले यह बताइये’। मैं ने कहा ‘हम रामपुर टान्डा बादली के पास से आये हैं। मौलाना साहब बोले, मेरे भाइयो। इतनी सर्दी में आपने इतना लंबा सफर किया। कितने थक रहे होंगे। यह आपका घर है, आप किसी गैर के यहाँ नहीं हैं। आप जो मालूम करेंगे हम बतायेंगे। पहले आप बैठिये, चाय, पानी, नाश्ता कीजिये, खाना खाइये। खबर हम लोगों ने नहीं छपवायी है, मगर है खबर सच्ची’ हम लोग कुछ ठण्डे हो गए थे फिर से गर्मी सी आ गई। मैं ने कहा ‘आप कैसे कह रहे हैं सच्चे लोगों का धर्म भ्रष्ट करना चाहते हैं। मौलाना साहब ने फिर प्यार से कहा ‘चलो अगर सच मानोगे तो मान लेना, वरना हमें उस की भी कोई जिद नहीं।’ आमिर और उमर में से मुहम्मद उमर इत्तफाक से एक नव-मुस्लिमों की जमाअत लेकर फुलत आए हुए थे जिस में सभी नव मुस्लिम थे। अमीर(जमात का अध्यक्ष, रहबरी करने वाला) न मिलने की वजह से मौलाना साहब ने उनको फुलत बुलाया था, जिन में तीन हरियाणा के थे और दो गुजरात के और चार यु. पी के, दो उन में मन्दिर के साधु भी थे। मौलाना साहब ने एक हाफिज साहब को बुलाया और उनसे कहा ‘उमर मियाँ को बुलाओ, थोडी देर में मुहम्मद उमर आ गए। मौलाना साहब ने हम से कहा ‘दो जिन की खबर छपी है उन में एक मुहम्मद उमर यह है। आप इन से मिल लें और मालूम कर लें खबर क्या है और कितनी सच्ची है?’ उमर भाई के साथ हम बराबर वाले छोटे कमरे में बैठ गये। मौलाना साहब ने उनको आवाज दी और कुछ समझाया। बाद में भाई उमर ने मुझे बताया कि मौलाना साहब ने मुझे बहुत ताकीद की कि ये कितना भी गुस्सा हों तुम सब्र करना और बहुत प्यार, नर्मी से मरीज समझकर बात करना और दिल ही दिल में अल्लाह से दुआ करना, मैं भी घर जाकर दो रकअत पढकर अल्लाह से हिदायत की दुआ करता हूँँ थोडी देर में नाश्ता आ गया। हम सभी को सर्दी लग रही थी। उमर भाई ने जिद करके दो प्याली चाय पिलाई और खूब खातिर की और हमें समझाते रहे और बताया कि पानीपत से सोनीपत तक आडवाणी जी की रथयात्राा में हम दोनों सब से ज्यादा पेश-पेश थे। 30 अक्तूबर को हम दोनों के ऊपर से गुम्बद पर गोली लगी थी। थोडी देर मेंे खाना भी आ गया। अब हम तीनों को लगा कि हमें जो खौफ था वह सच था और 6 दिसम्बर को हमारी यह हालत क्यों होती थी। मैंने उमर से कहा, अब हमें क्या करना चाहिये? उन्होंने बताया कि दुनिया का अजाब तो कुछ नहीं, मरने के बाद बडे दिन के अजाब से बचने के लिए आपको मेरी राय माननी चाहिये और कलमा पढकर मुसलमान हो जाना चाहिए। हम तीनों बाहर मश्वरे के लिए आने लगे, तो उमर भाई ने कहा ‘मैं एक काम के लिये बाहर जाता हूँँ आप अन्दर बैठे रहें। हम तीनों ने मशवरा किया और सब ने तै किया कि हम को मुसलमान हो जाना चाहिये। फिर उमर भाई को आवाज दी और अपना फैसला बताया। उमर भाई ने कहा ‘वह दो रकअत नमाज पढकर सच्चे मालिक से आप के लिये दुआ करने गये थे और मौलाना साहब भी आप के लिये दुआ ही करने अन्दर गये हैं। खुशी-खुशी उमर ने घर में मौलाना साहब को आवाज दी और दरख्वास्त की कि उन तीनों भाईयों को कलमा पढवा दें। मौलाना साहब ने हमें कलमा पढवाया। अहमद भाई वो हाल मैं बता नहीं सकता कि हम तीनों पर क्या गुजरी, जैसे-जैसे मौलाना साहब ने हमें कलमा पढवाया और तौबा करायी, ऐसा लग रहा था जैसे काँटों का एक लिबास जिस से जिस्म बंधा था, हमारे जिस्म से उतर गया। अन्दर से खौफ एकदम काफूर हो गया। जैसे हम न जाने किस खतरे से निकल कर एक महफूज किले में आ गए हों। मौलाना साहब ने मेरा नाम मुहम्मद इसहाक रखा, योगेश का मुहम्मद याकूब रखा और योगेन्द्र का मुहम्मद युसुफ और हजरत युसुफ, हजरत इसहाक और हजरत याकूब का किस्सा भी सुनाया और हमें बताया कि कल से फोन आ रहे थे कि यह खबर छप गयी है, खुदा खैर करे कोई फसाद न हो जा। मैं दोस्तों से कह रहा था आप डरिये नहीं हमने खबर नहीं छपवायी। अल्लाह ने छपवायी है इन्शाअल्लाह उस में जरूर खैर होगी। अल्लाह ने इतनी बडी खैर जाहिर कर दी। मौलाना साहब ने खडे होकर गले लगाया, मुबारकबाद दी और तीनों को किताब ‘आपकी अमानत, आपकी सेवा’ में दी।


अहमदः उस के बाद क्या हुआ?
इस्हाकः सुबह को नव-मुस्लिमों की जमाअत के साथ हम तीनों को शामिल कर दिया गया। एक मुफ्ती साहब बुलंदशहर के साल लगा रहे थे। उनको हमारा अमीर बनाया गया और दो लोगों को सिखाने के लिये शामिल किया गया। 15 लोगों की जमाअत एक रोज मेरठ रही। हम तीनों ने मेरठ में सर्टीफिकेट बनवाये और फिर जमाअत का रूख आगरा की तरफ बना। आगरा और मथुरा जिले में 40 दिन पूरे किये। जमाअत में वक्त ठीक लगा। नये-नये लोग थे एक दो बार लडाई भी हुई। एक रोज हम तीनों लडकर वापस आने की सोची। रात को पक्का इरादा किया कि सुबह को चले जायेंगे। रात में युसुफ ने एक ख्वाब देखा। मौलाना साहब फरमा रहे हैं, आपको अल्लाह ने किस तरह हिदायत दी, फिर भी आप अल्लाह के रास्ते से भाग रहे हैं। उस ने बाद में हम दोनों को बताया हम लोगों ने तय कर लिया कि जान भी चली जायेगी तो चिल्ला पूरा करके ही मौलाना साहब को मुँह दिखायेंगे। अल्हम्दुलिल्लाह हमारा चिल्ला पूरा हो गया।


अहमदः जमाअत से वापस आने के बाद क्या हुआ?
इसहाकः मौलाना साहब ने मुझ से मालूम किया कि अब आप का इरादा क्या है? और मशवरा दिया कि घर पर फौरन जाना ठीक नहीं है। मगर हम ने मौलाना साहब से कहा कि हम बच्चे नहीं हैं, मजहब हमारा जाती मामला है और हमारा हक है कि हक को मानें। हम घर जाकर घरवालों पर काम करेंगे और हमें किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। मौलाना साहब के समझाने के बावजूद हम लोग अपने गाँव पहुँचे। पूरे इलाके में माहौल खराब था। खबर मशहूर थी कि मुसलमानों ने उन तीनों को कत्ल कर दिया है। हम लोगों ने घरवालों को जाकर साफ-साफ बता दियां फिर क्या था पूरी बिरादरी में मातम मच गया। बार-बार पंचायत हुई, दूर-दूर के रिश्तेदार आ गये। एक बार अखबार वाले भी आ गये। गाँव वालों ने उन को पैसे दे दिलाकर वापस किया और राजी किया कि खबर अखबार में हरगिज न दी जाये वरना और भी लोगों को खतरा है। हमारे घरवालों पर बिरादरी वालों ने दबाव दिया कि अपने लडकों को किसी तरह बाज रखें। मगर अल्लाह का शुक्र है कि अल्लाह ने हमें मुखालिफत से और पक्का कर दिया। हमारे साथ बहुत सख्तियाँ भी होने लगीं। हमारी बीवी बच्चों को घर भेज दिया गया। मजबूरन हमें घर छोडना पडा। हमें फुलत जाते हुये शर्म आयी कि मौलाना साहब की बात नहीं मानी। हम लोग पहले दिल्ली गये और फिर एक साहब हमें पटना ले गये। पटना में हम ने बडी मुश्किल उठाई। कुछ दिन रिक्शा भी चलाई। जरूरत के लिये मजदूरी भी की। बाद में मुझे एक साहब अपनी कम्पनी में कलकत्ता ले गये और फिर मेरे दोनों साथी भी कलकत्ता आ गये। अलहम्दु लिल्लाह हमारी मुश्किल का जमाना ज्यादा लम्बा नहीं हुआ और अब हम सेट हैं। इस दौरान हम तीनों को बारी-बारी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जियारत भी हुई। जिस से हमें बडी तसल्ली हुई। मौलाना साहब की याद हम लोगों को बहुत आ रही थी। मगर मौका नहीं मिल सका। अल्लाह का करम हैं, आज मुलाकात हो गयी। मौलाना साहब से मिलने के बाद नौ दस महीने की सारी तकलीफें जैसे हुई ही नहीं थीं।


अहमदः अपने घरवालों से कोई राब्ता आपने किया कि नहीं?
इसहाकः हम लोगों ने फोन पर बात की है माँ और भाई बहनों से बात हो जाती है। पिताजी से बात तो नहीं हो पाती, इन्शाअल्लाह वक्त के साथ-साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। अलबत्ता मेरी बीवी और दोनों बच्चे अभी मेरी ससुराल मेंे हैं। वे बात नहीं करते हैं। मैं ने एक दोस्त को किसी तरह भेजा था। उसने हमारी ससुराल की एक मुसलमान औरत को उनके घर भेजा था। मेरी बीवी ने कहा जहाँ कहो जाने को तैयार हूँ। मेरी भाभियों से बिलकुल नहीं बनती और मैं खुद एक पति की रहकर मरना चाहती हूँ। आज मौलाना साहब से मशवरा हो गया है, मैं अब किसी तरह उनको लेकर ही जाऊँगा।


अहमदः दअवत के सिलसिले में आप से अबी (मौलाना कलीम सिददीकी साहब) ने कोई बात नहीं की, इस सिलसिले में कुछ बताइये?
इसहाकः मौलाना साहब ने हम से अहद लिया है कि बाबरी मस्जिद शहीद करने वालों की फिक्र करनी है और कारसेवकों पर काम करना है और उन के लिए और घरवालों के लिये दुआ करनी है, मौलाना साहब से मशवरा हुआ है, मैं बहुत जल्दी कलकत्ते से जमाअत में वक्त लगाऊँगा और अल्लाह के रास्ते में निकलकर अपने अल्लाह से मन्जूर करवाने के लिये दुआ करूँगा और फिर आकर घरवालों पर और कारसेवकों पर काम करूँगा।


अहमदः अरमुगान के कारिईन के लिये कुछ पैगाम दिजिये।
इसहाकः इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके मुसलमान होने की उम्मीद नहीं। सारे इस्लाम दुश्मन, गलतफहमी या न जानने की वजह से इस्लाम दुश्मन हैं। हमारे हाल से ज्यादा इसका और क्या सबूत हो सकता है। इस्लाम कुबूल करने से पहले हम बजरंग दली थे और इस्लाम और मुसलमान हमारे सब से बडे दुश्मन थे और अब हम ही हैं। यह तसव्वुर कि खुदा न ख्वास्ता हम हिन्दू मर जाते (धुड-धुडी देकर रोते हुये) तो हमारी हलाकत का क्या हाल होता? और किस तरह अल्लाह की नाराजगी और दोजख का हमेशा हमेशा का अजाब बर्दाश्त करते?

अहमद अव्वाहः शुक्रिया इसहाक भाई। आप तीनों का शुक्रिया। आप दोनों से भी किसी वक्त दोबारा बात होगी। अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुह।
इसहाक(अशोक): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाही व बरकातुह।
(साभारः मासिक ‘अरमुगान’ फुलत दिसम्बर 2007)
मास्टर मुहम्मद आमिर (बलबीर सिंह, पूर्व शिवसेना युवा शाखा अध्‍यक्ष) से एक मुलाकात - Interview - 1

Friday, July 2, 2010

मालिक सबका अल्लाह है ,उसी के नाम से शुरू करता हूँ अपना ब्लॉग .

मालिक सबका अल्लाह है ,उसी के नाम से शुरू करता हूँ अपना ब्लॉग .
ब्रसेल्स. फ़्रांस और कनाडा के बाद बेल्जियम भी बुर्क़े पर पाबंदी लगाने की तैयारी कर रहा है. संसद में आज बुर्क़े पर पाबंदी लगाने के लिए प्रस्ताव पेश किया गया. अब संसद की गृह मामलों की समिति इस मामले में बहस करेगी और उसकी बाद ही इस पर फ़ैसला लिया जाएगा. अगर बेल्जियम में इस मसौदे को समिति की मंज़ूरी मिल जाती है, तो इसके बाद इस पर वोटिंग होगी. अगर यह पारित हो जाता है तो बेल्यिजम सार्वजनिक स्थलों पर बुर्क़े पर पाबंदी लगाने वाला पहला यूरोपीय देश बन जाएगा.
इस्लाम पर ऐतराज़ करना गलत है .